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धनतेरस – भगवान धनवन्तरि जयन्ती

डा. के.एल. दहिया*

*पशु चिकित्सक, राजकीय पशु हस्पताल, हमीदपुर (कुरूक्षेत्र), पशुपालन एवं डेयरी विभाग, हरियाणा

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत विधिताओं का देश है जहाँ पर प्रति माह-प्रति सप्ताह कोई-न-कोई त्योहार मनाया ही जाता है। इनमें से दीवावली महापर्व विशेष रूप से देशभर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। दीपावली को पांच पर्वों में मनाया जाता है जिनमें से धनतेरस अर्थात धनत्रयोदशी को पहले पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी हिन्दू अपने सामर्थ्य अनुसार अपने घर के लिए, बाजार से कोई न कोई वस्तु अवश्य ही खरीदते हैं। इस दिन को धन और समृद्धि से सम्बन्धित लक्ष्मी-कुबेर की पूजा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग धन-सम्पत्ति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए देवी लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान कुबेर की भी पूजा करते हैं। भगवान कुबेर जिन्हें धन-सम्पत्ति का कोषाध्यक्ष माना जाता है और श्री लक्ष्मी जिन्हें धन-सम्पत्ति की देवी माना जाता है, की पूजा साथ में की जाती है। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवन्तरि प्राकट्य भी इसी दिन होने के कारण वैद्य समाज में धनतेरस को धन्वन्तरि के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे।

ऐसा माना जाता है भगवान धन्वन्तरि की चिकित्सा में इतनी शक्ति थी कि वे मृत व्यक्ति को भी जीवित कर दिया करते थे और उनकी चिकित्सकीय शक्ति से मुरझाया हुआ पौधा भी जीवित हो उठता था। इसीलिए आयुर्वेद के सभी चिकित्सक इस दिन इनका पूजन करते हैं और कामना करते हैं कि उनकी चिकित्सा में भी भगवान धन्वन्तरि जैसी शक्ति आ जाए।

यह धन्वंतरी ही थे जिन्होंने दुनिया के लिए आयुर्वेद की रचना की जिस कारण उन्हें आज भारत में चिकित्सा विज्ञान की सभी शाखाओं के संरक्षक भगवान के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने सुव्यवस्थित रूप से आयुर्वेद को आठ प्रभागों (अष्टांगों) में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक विशेषता का प्रतिनिधित्व करता था। चिकित्सा की इस प्रणाली को उनके शिष्यों ने आगे पढ़ाया और बढ़ाया। इन शिष्यों में सुश्रुत इस दिशा में सबसे आगे थे। धनवंतरी शिक्षाओं को उनके प्रसिद्ध शिष्य सुश्रुत की शिक्षाओं के माध्यम से अग्निपुराण में दर्ज किया गया है। धन्वंतरी निघंटु के नाम से जाने जाने वाले नौ खंडों में लिखा गया ‘मटेरिया मेडिका’ की एक प्रभावशाली शब्दावली है, जो संभवतः बाद के विद्वानों का रचना थी (Pai-Dhungat 2015)।

धनवन्तरि नाम मानव दुख दूर करने के लिए उपहार का संकेत देता है। उन्होने आयुर्वेद की रचना की जो मानव स्वास्थ्य के समग्र संवर्धन पर बल देता है न कि केवल चिकित्सा विज्ञान के उपचारात्मक पहलू पर। आधुनिक विज्ञान आज इसे रोगों की ठीक करने में वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में स्वीकार करता हुआ दिखाई देता है (Pai-Dhungat 2015)। इस महान दिव्य व्यक्तित्व की स्मृति के वंदन के रूप में, चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले व्यक्ति को भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष धनवंतरी पुरस्कार दिया जाता है। भारत में आमतौर पर धनतेरस के दिन को धन प्राप्ति के रूप में पूजा जाता है जबकि नेपाल में इस दिन को ‘स्वास्थ्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेपाल में 9 नवम्बर 1977 को भगवान धनवन्तरि की स्मृति  के रूप में डाक टिकट जारी की थी।

भारत में बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस आयुर्वेद के जनक धनवन्तरि की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन ख़रीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धनवन्तरि को अर्पित करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है। जीवन की सभी आवश्यकताओं को दूर रखते हुए ‘पहला सुख निरोगी काया’  बताया गया है। यदि शरीर ही रूग्ण अवस्था में रहता है तो संचित धन से उसे ठीक नहीं किया जा सकता है। इसीलिए आयुर्वेद के पिता धनवन्तरि के एक हाथ में सोने से बना अमृत कलश होता है जिसका सीधा सा अर्थ स्वास्थ्य से है न कि विचलित आधुनिक काल में धन से। भगवान धनवन्तरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उन्होंने चिकित्सा के अलावा फसलों का भी गहन अध्ययन किया। पशु-पक्षियों के स्वभाव, उनके मांस के गुण-अवगुण और उनके भेद भी उन्हें ज्ञात थे। मनुष्य की भोज्य सामग्री का जितना वैज्ञानिक विवेचना धनवन्तरि की है, वह आज के युग में भी प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है। आयुर्वेद के जनक के रूप में आयुर्वेदाचार्य अपने लेखों में उनके प्रति कृतघ्यता जाहिर करते हैं और उनको अपनी कृतियों को समर्पित करते हैं।

भारत में आयुष मंत्रालय द्वारा प्रत्येक वर्ष धनवंतरी जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर, मंत्रालय 3-4 आयुर्वेद विशेषज्ञों को ‘राष्ट्रीय धनवंतरी आयुर्वेद पुरस्कार’ से भी सम्मानित करता है। आयुर्वेद एक व्यापक कार्यक्रम में विस्वास करता है, जिसमें जागरुक भोजन (आहार), रहन-सहन (विहार), नींद (निद्रा), दीर्घायु (स्वस्थ्य जीवनकाल) के विस्तार के लिए व्यवहारात्मक एवं मनोवैज्ञानिक क्रियाकलाप शामिल हैं। रसायन तंत्र, आयुर्वेद की आठ शाखाओं में एक है, जो कायाकल्प, ऊर्जा संचार, रोग प्रतिरक्षण, स्वस्थ रूप से जीवन बढ़ाने और दीर्घायु बनाने के लिए समर्पित है। वर्ष 2018 (5 नवम्बर) को मनाई गई ‘धनवन्तरि जयन्ती’ के अवसर पर भारत सरकार द्वारा वर्ष 2022 तक आयुर्वेद मार्केट शेयर तीन गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।

सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं, अन्वेषितं च सविधिं आरोग्यमस्य।

गूढं निगूढं औषध्यरूपम्, धन्वन्तरिं व सततं प्रणमामि नित्यं।।

जिन्होने निरंतर समस्त रोग दूर किये, जिन्होने आरोग्य विधि बताई, जिन्होने औषधीयों के छुपे स्वरूप को बताया, उन धनवन्तरि भगवान को मैं सदैव प्रणाम करता हूँ।

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