Home / Ethno Veterinary Medicine / एथनोवेटरीनरी पशु चिकित्सा

एथनोवेटरीनरी पशु चिकित्सा

डा. के.एल. दहिया*
*पशु चिकित्सक, राजकीय पशु हस्पताल, हमीदपुर (कुरूक्षेत्र)
पशुपालन एवं डेयरी विभाग, हरियाणा

प्राकृतिक चिकित्सा एक ऐसी अनूठी पद्दति है जिसमें जीवन के शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक खण्डों के रचनात्मक सिद्धांतों के साथ व्यक्ति के सद्भाव का निर्माण होता है। इसमें स्वास्थ्य प्रोत्साहन, रोग निवारक और उपचारात्मकता के साथ-साथ शरीर में दोबारा से मज़बूती प्रदान करने की भी अपार संभावनाएं हैं। ब्रिटिश नेचरोपैथिक एसोसिएशन के घोषणापत्र के अनुसार “प्राकृतिक चिकित्सा, उपचार की एक ऐसी प्रणाली है जो शरीर के अन्दर महत्वपूर्ण उपचारात्मक शक्ति के अस्तित्व को मान्यता देती है।” अतः यह पद्दति रोगों के कारण दूर करने के लिए अर्थात रोग ठीक करने के लिए शरीर से अवांछित और अप्रयुक्त अर्थात विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर शरीर प्रणाली की सहायता का समर्थन करती है।
एथनोवेटरीनरी (Ethnoveterinary) प्राकृतिक पशु चिकित्सा की एक ऐसी परम्परागत पशु चिकित्सा पद्धति है जिसमें पशुओं के उपचार के लिए पौधों एवं उनके उत्पादों का उपयोग आस्था और विश्वास के साथ किया जाता है। एथनोवेटरीनरी शब्द का उपयोग सबसे पहले 1986 में मैक कोरक्ले (Mc Corkle) ने किया था। यह पारंपरिक ज्ञान कुछ व्यक्तियों के लिए अनमोल और सीमित है, जिन्हें समाज में प्रलेखित और लागू करने की आवश्यकता है। उपचार में पौधों और उनके भागों और उत्पादों के उपयोग के बहुत फायदे हैं, क्योंकि वे सस्ते हैं, आसानी से उपलब्ध हैं और उनके कोई दुष्प्रभाव भी नहीं हैं।
भारत और विदेशों के विभिन्न हिस्सों में इस छिपे हुए ज्ञान का मूल्यांकन और आलेख करने के लिए बहुत सारे कार्य किए गए हैं, लेकिन अभी भी यह जानकारी दुर्लभ है और दूसरों के लिए अस्वीकार्य है। ऋग्वेद, अथर्ववेद और आयुर्वेद, पशु चिकित्सा के रूप में पौधों के उपचारात्मक गुणों के बारे में जानकारी देने वाले अग्रणी दस्तावेज हैं। इसलिए, वैदिक काल (3500 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व) तक, भारतीय चिकित्सक (वैद्य) और जड़ी-बूटीयों के ज्ञाता धनवंतरी, अत्रेय, नागार्जुन, पतंजलि, बागभट्ट, शुश्रुत और चरक आदि महान व्यक्तित्वों के रूप में प्रकट हुए जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति का अभ्यास किया। भारत में पशु चिकित्सा पद्दती के अस्तित्व का पहला साहित्यिक प्रमाण ऋग्वेद (2000-1400 ई.पू.) में पाया जाता है (Ghotke 2004)।
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में विभिन्न बीमारियों का इलाज करने के लिए बहुत से पौधों की प्रजातियों का उपयोग किया जाता है। यह एक अच्छी तरह से स्थापित तथ्य है कि पौधे आम लोगों के विभिन्न रोगों और विकारों के इलाज के लिए एक आवश्यक भूमिका निभाते हैं। प्राकृतिक स्वास्थ्य के लिए औषधीय पौधे हमारी प्रकृति का बहुमूल्य उपहार हैं। आधुनिक औषधियों की एक बड़ी संख्या को प्राकृतिक स्रोतों से लिया गया है, जो कि अधिकतर वनस्पति जगत से ही प्राप्त होती हैं। वनस्पति आधारित पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली स्वास्थ्य देखभाल में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए बनी रहती है, जिसमें विश्व की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या इलाज के लिए नियमित रूप से विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए पारंपरिक औषधीयों पर निर्भर रहती है (Jabbar 2006) जबकि भारत में लगभग 65 प्रतिशत जनता पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर है (Binorkar 2012)।
एथनोवेटरीनरी में स्थानीय चिकित्सकों का ज्ञान परम्परागत चिकित्सा पद्धति में उनकी जानकारी और अनुभव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है लेकिन प्रालेखित न होने के कारण उनका यह ज्ञान सिकुड़ता जा रहा है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि परम्परागत चिकित्सा में उपयोग किये जाने वाले पेड़-पौधों के बारे में प्रचलित ज्ञान अपरिवर्तनीय हानि और विलुप्ति के कगार पर है क्योंकि इस परम्परा का प्रचार-प्रसार केवल मौखिक रूप से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी किया जाता रहा है।
तेजी से सामाजिक-आर्थिक, तकनीकी और पर्यावरणीय परिवर्तनों से स्थिति, बिगड़ती जा रही है। पर्यावरणीय क्षरण, कृषि विस्तार, सीमांत भूमि की खेती, और शहरीकरण भी मानव और पशु आबादी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा पैदा कर रहे हैं जो इन संसाधनों पर पीढ़ियों से विभिन्न बीमारियों का मुकाबला करने के लिए निर्भर हैं। इसलिए, यह देश के परम्परागत औषधीय वनस्पतिक विद्या को प्रलेखित करने, बढ़ावा देने और संरक्षण प्रदान करने के लिए सही समय पर एक प्रयास है। इस तरह के प्रलेख लोगों की सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करने और बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह लोगों को केन्द्रित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणालियों की स्थापना की ओर कुंजी के रूप में सेवा करने के अलावा, नए यौगिकों की वैज्ञानिक खोज की क्षमता के रूप में आधुनिक दवाओं के विकास में उपयोगी हो सकते हैं। एथनोवेटरीनरी प्रैक्टिस का प्रमाणीकरण अत्यन्त रूप से आवश्यक है ताकि इस ज्ञान को संरक्षित किया जा सके और पेड़-पौधों को निरंतर पशुओं के रोगों के नियंत्रण के लिए संरक्षित किया जा सके।
एथनोवेटरीनरी की कुछ सीमाएं हैं जैसे कि इस पद्धति के अंतर्गत विभिन्न रोगों का निदान अपर्याप्त होने के साथ-साथ तीव्र जीवाणु एवं विषाणु रोगों की पहचान एवं उनकी चिकित्सा में कम निपुणता है जबकि आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत उपलब्ध टीकाकरण से विषाणु जनित रोगों का नियन्त्रण सम्भव होता जा रहा है। एक तकनीकी दृष्टिकोण से, कुछ मामलों में एथनोवेटरीनरी चिकित्सा कुछ हद तक अप्रभावी सी लगती है क्योंकि मौसम, उनसे औषधी तैयार करने और सेवन की विधि के अनुसार उनकी इलाज की प्रभावशीलता में परिवर्तन देखने को मिलता है। आमतौर पर उनके सेवन की विधि स्थानीय स्तर की होती है और उनके आगे प्रचार-प्रसार की संभावना भी सीमित ही होती है। अधिकांशतः विषाक्तता और अल्प मात्रा देने के मामले अधिक होते हैं क्योंकि उनके सेवन के संबंध में शारीरिक भार के अनुसार (प्रति किलोग्राम) सेवन की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। दूसरी ओर, अत्याधिक-कटाई से वनस्पति विविधता को भी खतरा है जिसमें अर्ध-शुष्क क्षेत्र एवं चरागाहें इत्यादि शामिल हैं। वनों की अत्याधिक कटाई से जीव विविधता को भी खतरा है।
हालांकि, कुछ कमीयों के बावजूद, एथनोवेटरीनरी चिकित्सा की प्रभावकारिता आमतौर पर दस्त, दुग्धोत्पादन, घाव, कोक्सीडायोसिस और प्रजनन संबंधी विकारों जैसे सामान्य पशुधन रोगों के नियन्त्रण के लिए व्यापक स्तर पर सिद्ध हुई है। हाल के वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों के शोधकर्ताओं की बढ़ती संख्या ने देशी और स्थानीय समुदायों में पारंपरिक पशु स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणालियों की संभावित प्रभावशीलता का अध्ययन, मूल्यांकन, पुष्टि, सत्यापन और दस्तावेजीकरण किया है। अनुसंधानकर्ताओं ने पशु पालकों द्वारा पहले से उपयोग की जाने वाली पौधों की प्रजातियों के लिए वनस्पति रासायन विज्ञान और उनके शरीर में कार्य के तरीकों की समझ भी प्रदान की है। शोधों के परिणामों में कई प्रकार के कीटनाशक युक्त पौधों का पता चला है जिनको पशुओं के इलाज के लिए विस्वासपूर्वकता और सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है। इन वनस्पति उत्पादों का कानूनी पंजीकरण आमतौर पर उनके प्रचार के लिए आवश्यक नहीं होता है। इस दृष्टिकोण से ग्रामीण आँचल में मौजूद पशुओं के प्रदर्शन एवं उत्पादन में सुधार के लिए उपयुक्त स्थायी रणनीति उपलब्ध करवाने के साथ-साथ स्थायी आजीविका में भी सुधार किया जा सकता है।
इन कमियों के होने के बावजूद भी एथनोवेटरीनरी चिकित्सा स्वतंत्र रूप से हर किसी के लिए उपलब्ध है और मूल्य अनुपात के आाधार पर सस्ते में उपलब्ध हो जाती है। इसके अन्तर्गत तैयार औषधी को आसानी से मुँह द्वारा अथवा पशु के शरीर पर लगाया जा सकता है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में रोगरोधी दवाओं की रोगाणुओं के प्रति रोगप्रतिरोधकता बढ़ रही है लेकिन एथनोवेटरीनरी चिकित्सा में रोगाणुओं के प्रति रोगप्रतिरोधकता का प्रभाव नहीं है या नगण्य ही है। अतः वनस्पतियों का ज्ञान रखने वाले इसका उपयोग निरंतर कर रहे हैं।
आधुनिक पशु चिकित्सा पद्धति में उपयोग की जाने वाली औषधीयों के रोगी पशुओं में उपयोग के बाद उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थों का सेवन वैज्ञानिक तौर से कुछ दिनों के लिए निषेद्धित किया जाता है ताकि इन पदार्थों के सेवन से पशुओं को दी गई औषधीयों के अंश मानव आहार श्रृंखला में न जाने पाएं। मानव आहार श्रृंखला में प्रवेशोप्रान्त इन औषधीयों के प्रति मानवों में रोगप्रतिरोधकता बढ़ जाने का खतरा रहता है और कई बार एक अच्छी औषधी भी कारगर साबित नहीं हो पाती है। इसके साथ ही रोगी पशु के इलाज के दौरान उपयोग की जाने वाली औषधीयों के कारण उनके द्वारा उत्सर्जित उत्पादों के निषेद्धकरण से पशु पालक को आर्थिक हानि भी होती है अतः इस हानि से बचने के लिए वह इन उत्पादों खासतौर से दूध, अण्डा इत्यादि को बाजार में बेचता है। इसलिए सामान्य घटना है कि रोगाणुरोधी औषधीयों के अवशेष मानव आहार श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं जो मानव समाज के लिए भविष्य में खतरे की ओर इशारा करते हैं। मानव आहार श्रृंखला में औषधी संदूषण को रोकना बहुत ही मुश्किल कार्य है। हालांकि, आधुनिक पशु चिकित्सा को किसी भी हालात में नकारा नहीं जा सकता है लेकिन साथ ही परम्परागत पशु चिकित्सा अर्थात एथनोवेटरीनरी को भी नजर अन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।
आज के आधुनिक दौर में भी स्वयं का उपचार करने के साथ-साथ बहुत से पशु पालक अपने रोगी पशुओं का इलाज स्वयं ही करते हैं। अत्याधिक अथवा गम्भीर अवस्था में ही वे चिकित्सक के पास इलाज के लिए जाते हैं। इतना ही नहीं बहुत से चिकित्सक भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ देशी जड़ी-बूटीयों से तैयार बाजार में उपलब्ध औषधीयों से इलाज कर रहे हैं। अतः आज के इस आधुनिक दौर में विलुप्तप्रायः वनस्पतियों पर गहन शोध कार्य की आवश्यकता है।
आज भारत में परम्परागत चिकित्सा का एक अच्छा उदाहरण प्राकृतिक खेती है जिसमें न केवल यूरिया इत्यादि उर्वरकों का बल्कि रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग भी वर्जित है और बहुत ही कम मात्रा में खाद के उपयोग से अच्छा कृषि उत्पादन लिया जाता है जिससे अन्न के माध्यम से मानव आहार श्रृंखला में पहुंचने वाले घातक रासायनों को रोका जाता है। इसी प्रकार प्राकृतिक खेती के अन्तर्गत उत्पादित चारा पशुओं को खिलाने से पशु आहार श्रृंखला में प्रवेशोप्रान्त न केवल पशु जन्य दूध एवं अण्डा जैसे उत्पादों में कीटनाशकों के अंश को समाप्त किया जा सकता है बल्कि इसके माध्यम से पशु चिकित्सा मानवीय समाज को निरोगी शरीर रखने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के पशु उत्पादों में हुए शोधों से ज्ञात हुआ है कि मनुष्य ही नहीं वरन् पशु भी रासायनों से अछूते नहीं हैं। पशु जन्य उत्पाद खासतौर पर हर मनुष्य के दैनिक आहार का हिस्सा दूध भी इससे अछूता नहीं है (भास्कर 2017)। इन शोधों से यह भी ज्ञात होता है कि मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं में इन रासायनों से बीमारियाँ बढ़ रही हैं। कीटनाशक मिले दूध के लगातार सेवन से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, जिनमें मुख्य रूप से कैंसर, गुर्दे के रोग, जीगर रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, उदर रोग और आँखों के रोग होते हैं। पशुओं और मनुष्य में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। इन बीमारीयों के कारण औसत आयु भी कम हो जाती है। खेती में अन्धाधुन्ध रासायनों के उपयोग से बहुत से पक्षी जैसे कि घरेलू चिड़ीया, कौवे, गिद्धों की संख्या में भारी कमी आई है। ऐसे में एथनोवेटरीनरी चिकित्सा एवं रासायन मुक्त खेती के माध्यम से पशु जन्य उत्पादों से इनके संदूषण को दूर किया जा सकता है।
इस पृथ्वी पर, वनस्पति रूपी मौजूद या उत्पादित संसाधन के बिना जीवनयापन संभव नहीं है। इस बात का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के लिए वनस्पतियों का ही सेवन किया जाता है। पशुओं से दुग्ध उत्पादन करने के लिए वनस्पति जनित आहार ही दिया जाता है। विश्व की पहली प्रतिजैविक औषधी पेनिसीलिन भी वनस्पति जनित ही है और आज भी विभिन्न प्रकार की वनस्पति जनित प्रतिजैविक औषधीयों का उपयोग निरंतर जारी है। दुग्ध उत्पादन करने वाले पशु का केवल चारा ही बन्द करने मात्र से उसका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होने के साथ-साथ उसका दुग्ध उत्पादन भी अत्यधिक कम हो जाता है। अतः वनस्पति जनित औषधी विज्ञान रूपी आयुर्वेद को कभी भी नजर अन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। यही वनस्पति औषधी विज्ञान ही रूग्ण होते शरीर को ठीक करने में सक्षम है। आज आवश्यकता है तो केवल इस ओर गहनता से सोच-विचार की, इस ओर सकारात्मक कदम बढ़ाने की और आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ वनस्पति औषधी विज्ञान रूपी ‘एथनोवेटरीनरी’ चिकित्सा की भी ताकि भविष्य की नई बीमारियों के मण्डराते खतरे को कम किया जा सके।
हालाँकि परम्परागत चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत सारे कार्य लगातार किए जा रहे हैं लेकिन इस पुस्तिका में विभिन्न प्रकार के आलेखों पर बल दिया गया है जिनका पशु चिकित्सक एवं पशु पालक लाभ उठा सकते हैं जो पशु पालकों की आजीविका बढ़ाने में सहयोग दे सकते हैं। इतना ही नहीं, यदि पशु चिकित्सा के ज्ञाता इस दिशा में सकारात्मक विचार के साथ कार्य करते हैं तो वे ‘एक चिकित्सा – एक स्वास्थ्य’ की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिसमें मानवीय चिकित्सक, पशु चिकित्सक, कृषि वैज्ञानिक, आयुष चिकित्सक एवं पर्यावरण सरंक्षक मुख्य भूमिका निभा सकते हैं। एक सदी पहले रुडोल्फ विरचॉव ने भी कहा था (NRC 2005):

“पशु और मानव चिकित्सा के बीच कोई विभाजित रेखा नहीं है – न ही होनी चाहिए। वस्तु अलग है, लेकिन प्राप्त अनुभव सभी चिकित्साओं का आधार बनता है”। – रुडोल्फ विरचॉव (1821-1902)
“Between animal and human medicine there is no dividing line – nor should there be. The object is different but the experience obtained constitutes the basis of all medicine.” – Rudolf Virchow (1821–1902)

यदि आधुनिक दौर में रूडोल्फ विरचॉव के शब्दों का गहनता से विचार किया जाए तो आयुर्वेद के माध्यम से परम्परागत चिकित्सा पद्धति के समावेश से ही ‘एक चिकित्सा – एक स्वास्थ्य’ की परिकल्पना की जा सकती है। अतः एथनोवेटरीनरी चिकित्सा की अहम् भूमिका हमारे सामाजिक परिवेश में अभी भी बखूबी कार्यशील है जिसको आधुनिक वैज्ञानिक स्तर पर बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि विलुप्तप्रायः इस पद्धति से लाभ उठाया जा सके।

+0-00 ratings

About admin

Check Also

Monograph on Garlic : EthnoMedicinal Uses and Cultivation

Monograph-on-Garlic-EthnoMedicinal-Uses-and-Cultivation +0-00 ratings

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *