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ए1 और ए2 दूध: मिथक और तथ्य

के.एल. दहिया

पशु चिकित्सक, पशु पालन एवं डेयरी विभाग, कुरूक्षेत्र, हरियाणा

दूध प्रकृति द्वारा ​दिया एक अमूल्य पदार्थ है। यदि किसी परिवार में दूधारू पशु हैं तो उस परिवार में भूखे मरने की नौबत नही आती है। 1990 के दशक में, न्यूजीलैंड में इलियट और मैकलैक्लन ने एक परिकल्पना विकसित की कि कुछ गायों के दूध में प्रोटीन का एक यौगिक होता है जिससे टाइप-1 डायबिटीज और हृदय धमनी रोग जैसी बीमारियां होने की संभावना होती है। विश्व में हुए गहन शोधों के अनुसार ए1 प्रकार के दूध के सेवन और मधुमेह एवं हृदय धमनी रोग के संबंध में विभिन्न राष्ट्रों के मध्य और विभिन्न प्रकार के दूध का सेवन करने वालों के विचार अविश्वसनीय रहे हैं और अधिक राष्ट्रों के आंकड़े उपलब्ध होने पर ए1/ए2 भ्रान्ति को नकार दिया गया। यह सर्वविदित है कि यूरोप और अमेरिका में लोग सदियों से ए1 दूध का सेवन कर रहे हैं और सामान्य जन में इस दूध के सेवन का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं है। भारत में भी लोग बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव के 50 वर्षों से अधिक समय से संकर नस्ल की गायों का दूध पी रहे हैं। सौभाग्य से, गाय के दूध की तुलना में भारत में उत्पादित दूध का लगभग 50 प्रतिशत भैंस द्वारा योगदान दिया जाता है, जिसमें वसा, प्रोटीन, लैक्टोज और कैल्शियम अधिक और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। इस प्रकार देखा जाए तो हमारे जीवन में दूध का अति विशिष्ट महत्त्व है और अब तक टाईप ए1/ए2 दूध पर हुये शोधों के मद्देनजर दूध का सेवन निर्बाध रूप से करते रहना चाहिए।

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