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डेयरी पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान: इतिहास, फायदे एवं सीमाएं

के.एल. दहिया1, जसवीर सिंह पंवार2 एवं अत्तर सिंह1

1पशु चिकित्सक, 2उप मण्डल अधिकारी, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, कुरूक्षेत्र, हरियाणा।

पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान एक ऐसी कला या विधि है जिसमें साँड से वीर्य लेकर उसको विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से संचित किया जाता है। यह संचित किया हुआ वीर्य तरल नाइट्रोजन में कई वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इस संचित किए हुए वीर्य को मद में आई मादा के गर्भाश्य में रखने से मादा पशु का गर्भाधान किया जाता है। गर्भाधान की इस विधि को कृत्रिम गर्भाधान कहा जाता है। कृत्रिम गर्भाधान उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुधन प्रदान करने वाली चल रही तकनीकों का परिणाम है। कृत्रिम गर्भाधान के अनुभव से प्राप्त ज्ञान जैसे कि प्रजनन तकनीक, सुपरोव्यूलेशन, भ्रूण स्थानांतरण और क्लोनिंग, ने चरणबद्ध बेहद मददगार भूमिका निभाई। इसके साथ ही आम जनता तक अच्छी जानकारी पहुंचायी जा रही है जो इस जानकारी को सुगमता से ग्रहण भी कर रही है। इसके अंतर्निहित नैतिक अनुप्रयोग ने पूरे समुदाय को लाभान्वित करके सकारात्मक बदलाव किया है।

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