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प्रश्नोत्तरी – रेबीज : एक घातक रोग

के.एल. दहिया

पशु चिकित्सक, पशु पालन एवं डेयरी विभाग, हरियाणा

आज के इस परिवर्तनशील दौर में हमारा रहन-सहन बदलने के साथ-साथ हमारा पशु पालने का तरीका भी बदल रहा है। इस परिवर्तनशील एवं प्रगतिशील दौर में हमने बहुत अर्जित भी किया है। जो परिवार पशुओं को पालना धीरे-धीरे बन्द कर चुके थे व शहरों की ओर पलायन कर चुके थे, अब उनमें कुत्तों को पालने का शौक बढ़ता जा रहा है। साथ ही कुत्तों से होने वाली बीमारियाँ खासतौर पर कुत्तों के काटने से मानवीय रेबीज के कारण मृत्युदर में बढ़ौत्तरी हो भी रही है। रेबीज के प्रति प्रभावशाली टीकाकरण होने के बाद भी ये मौतें शहरी आबादी की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा देखने को मिलती हैं।

मनुष्यों में विश्वभर में प्रति वर्ष 60000 से भी ज्यादा मौतें रेबीज के कारण होती हैं। इन में से 95 प्रतिशत मौतें कुत्तों के काटने से ही होती हैं। अत: रेबीज से होने वाली मौतों को कम करने या अंकुश लगाने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि इस रोग के बारे में समाज व्याप्त भ्रान्तियों को भुलाते हुए वैज्ञानिक पद्दती के तहत ही कुत्ते या अन्य किसी भी प्रकार के रेबीज विषाणु के संवाहक पशु के काटने के तुरन्त बाद बिना किसी देरी के योग्य चिकित्सक की देखरेख में ईलाज करवाना शुरू कर दें। देरी से किये गये रोगप्रतिरोधक टीकाकरण प्रभावशाली होते हुए भी प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे समाज में टीकाकरण के बारे में गैर-मुमकिन भ्रान्ति पैदा हो जाती है और आमजन टीकाकरण से दूर रह जाते हैं जिस कारण रेबीज से मृत्यु होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इस पुस्तिका का उद्देश्य भी यही है कि समाज को रेबीज के बारे में ज्यादा ज्ञानोपार्जन हो ताकि रेबीज से होने वाली अकाल मौतों को रोका जा सके। आशा की जाती है कि यह पुस्तिका अपने उद्देश्य में सक्षम होगी।

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