होली का बदलता स्वरूप – जीवन में रस का प्रतीक
के.एल. दहिया
उपमण्डल अधिकारी (सेवानिवृत्त), पशुपालन एवं डेयरी विभाग, हरियाणा
होली का उत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है जो फरवरी और मार्च के महीने में पड़ती है। पहले दिन होलिका दहन किया जाता है जिसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है। होलिका दहन के अगले दिन रंग, गुलाल और उत्सव का आनंद लिया जाता है। होली का उत्सव असुर राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका से जुड़ा पर्व पुराणों में बताया गया है। भारत में होली अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है जैसे- ब्रज क्षेत्र में लठमार होली, पश्चिम बंगाल में बसंत उत्सव, पंजाब में होला-मोहल्ला आदि। होली एक बहुरंगी सांस्कृतिक परम्परा है।
होली का परिचय
होलिका दहन बसन्त ऋतु के फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की शाम को किया जाता है और अगले दिन अर्थात चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को होली का त्योहार ‘रंगों’ के रूप में मनाया जाता है। होलिका दहन से अगले दिन मनाये जाने वाले होली के त्योहार को धुलेंडी, धुलेटी, धुलंडी, धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन के नामों से भी जाना जाता है। इसे ‘फाग’ भी कहते हैं। फाल्गुन लगते ही सर्दी जाने लगती है और औरतें-पुरूष, बच्चे-बूढ़े खुश होने लगते हैं, नाचने लगते हैं। फाल्गुन में मस्ती आ जाती है। फाल्गुन का महीना मस्ती का महीना है और इस दौरान रसिया गाए जाते हैं। बसन्त ऋतु के आगमन पर, फाल्गुन मास के लगते ही “मस्त महीना फागन का, रसिया आ जाए तो खेले होली फाग। काजल की डिबिया खोल बिसाती, लगा महीना फागन का“ स्वर गुंजायमान होता आपने सुना होगा।
जीवन में यदि एक रसता हो, जीवन एक सपाट हो तो जीवन निरस हो जाए, तो इस प्रकार से जीवन में बीच-बीच में पर्व अर्थात त्योहार आते हैं। त्योहार के समय सभी मनुष्यों में उल्लास होता है, वे इसे उत्सव की तरह मानते हैं। मनुष्य स्वभाव से उत्सव का प्रेमी है। उत्सव शब्द का अर्थ क्या है? उत्सव कि जैसे घड़ा भरता है, फिर छलकने लगता है, तो मन आनंद से भर जाए और छलकने लगे तो यह ‘उत्सव’ है। आनंद की छलकन ही उत्सव है। तो उत्सव शब्द का अर्थ है आनंद की झलकन। जीवन किस लिए जी रहे हैं कहीं ना कहीं कोई आनंद का बिंदु है और उस आनंद के बिंदु की खोज के लिए जी रहे हैं। आनंद के उपनिषद को जिजीविषा[1] और रिरंसा[2] कहा गया है अर्थात ‘जीने की इच्छा और आनंद की प्रसन्नता की इच्छा’ तो जीवन कहीं-न-कहीं आनंद के लिए है व सचाई तो ये है कि जो सारे दर्शन कहीं-न-कहीं, अब यदि वो मुक्ति कहें तो भी दुखों से मुक्ति है। बुद्ध ने उसे निर्वाण कहा, दुख से अत्यंत निवृत्ति, तो दुख की निवृत्ति वही तो सुख है, वही तो आनंद है, शब्द अलग हैं उनकी संकल्पना (Concept) अलग है। वह सारी चीजें अलग हैं, मुक्ति भी वहीं है, निर्वाण भी वहीं है और रस भी वहीं है, आनंद ही तो रस है। तो मूल जो चीज है, वह आनंद है, उसको नाम आप कुछ भी दे दीजिएगा। अब यह अलग बात है कि किसी की प्रवृत्ति ‘यहां’ आनंद को मान रही है, किसी की प्रवृत्ति ‘वहां’ आनंद को मान रही है। तो उस आनंद की जो खोज है, उसमें ये त्योहार आते हैं, उसमें ये उत्सव आते हैं, आनंद की झलकन आती है।
ब्रज में श्री कृष्ण की होली, बनारस में “दिगंबर खेले मसाने की होरी”, अवध में राम की होली का गायन होता है। तो माने होली जो है वह इन क्षेत्रों की, प्रदेशों की सीमाओं को लांघ चुकी है। अब यदि एक ही त्योहार होता, एक जाति का त्योहार होता, एक धर्म का त्योहार होता, तो कहीं-न-कहीं उसकी सीमा होती। होली का त्योहार धर्म की सीमा को और संप्रदाय की सीमा को भी तोड़ रहा है। मुगल भी मना रहा है, मुसलमान भी उसको मना रहा है, विदेशों में भी मनाया जा रहा है, अमेरिका के व्हाईट हाउस में और एक जनपद की सीमा को भी तोड़ रहा है, प्रदेश-देश की सीमा को भी तोड़ रहा है। वो इसलिए तोड़ रहा है कि उसका प्रयोजन (Purpose) व्यापक है उसकी आनंद की झलकन व्यापक है। यह “त्योहारों का त्योहार” है, तो उसके कारण भी एक नहीं हो सकते। उसके स्रोत भी एक नहीं हो सकते। घर से आदमी निकलता है अकेला निकलता है फिर चार आदमी मिल गए और आगे 14 आदमी मिल गये और आगे चले 24 आदमी मिल गए। तो जो सांस्कृतिक तत्व है उनका भी विकास इसी प्रकार से होता है। कितनी संस्कृतियां होली में समाई हुई हैं। होली एक संस्कृति का त्योहार नहीं है। यह कितनी संस्कृतियों का त्योहार है।
फाल्गुन के महीने में होली सारे उत्तरी भारत खासतौर पर उत्तर प्रदेश में मननी शुरू हो जाती है। जिस दिन फाल्गुन शुदी दूज उसको ‘फुलेरा दूज’ भी कहते हैं, रंग और गुलाल उड़ने लगता है। सड़कें गुलाल से भर जाती हैं। ब्रज की होली तो सारी दुनिया में मशहूर है। हजारों लोग ब्रज में होली देखने व खेलने के लिए आते हैं। अब ब्रज की होली अमेरिका तक पहुंच गई है। अमेरिका के व्हाईट हाउस में दो त्योहार मनाए जाते हैं – दिवाली का त्योहार और रंगों का अर्थात होली का त्योहार। होली का त्योहार बड़ा पवित्र त्योहार है। लकड़ियों और अन्य जलावन की होली रखी जाती है, और शाम के समय सुहागिन औरतें उसकी पूजा करने आती हैं, उसके चारों तरफ सूत के धागे सात बार लपेटती हैं। होली पर तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और फिर घर में जितने भी पकवान बने होते हैं, उनसे होली को जिमाती है, उसको होली पर चढ़ाती हैं, खिलाती हैं, भोग लगाती हैं और उसके बाद ही कोई चीज घर में खाई जाती है। तो, होली क्यों पूजी जाती है? यदि होली राक्षसी है तो उसकी पूजा क्यों करते हैं? तो होली के बारे में विस्तारपूर्वक सकारात्मकता से चर्चा करें।
[1] जिजीविषा का अर्थ है ‘जीने की प्रबल इच्छा’ या जीवन के प्रति गहरा अनुराग। यह एक संस्कृत मूल का शब्द है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने, संघर्ष करने और जीवन का आनंद लेने की जुनूनी चाह को दर्शाता है। यह सकारात्मक दृष्टिकोण, जीवन शक्ति और मृत्यु या निराशा पर जीवन की विजय का प्रतीक है।
[2] रिरंसा यौन व्यवहार या आचरण है जिसे असभ्य और अपमानजनक माना जाता है, या स्थानीय नैतिक या उचित व्यवहार के अन्य मानकों के विपरीत है।
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